बुधवार, 18 दिसंबर 2013

अब आ पड़ी मियां की जूती मियां के सर .

Muslim bride and groom at the mosque during a wedding ceremony - stock photo
फिरते थे आरज़ू में कभी तेरी दर-बदर ,
अब आ पड़ी मियां की जूती मियां के सर .
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लगती थी तुम गुलाब हमको यूँ दरअसल ,
करते ही निकाह तुमसे काँटों से भरा घर .
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पहले हमारे फाके निभाने के थे वादे ,
अब मेरी जान खाकर तुम पेट रही भर .
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कहती थी मेरे अपनों को अपना तुम समझोगी ,
अब उनको मार ताने घर से किया बेघर .
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पहले तो सिर को ढककर पैर बड़ों के छूती ,
अब फिरती हो मुंह खोले न रहा कोई डर .
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माँ देती है औलाद को तहज़ीब की दौलत ,
मक्कारी से तुमने ही उनको किया है तर .
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औरत के बिना सूना घर कहते तो सभी हैं ,
औरत ने ही बिगाड़े दुनिया में कितने नर .
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माँ-पिता,बहन-भाई हिल-मिल के साथ रहते ,
आये जो बाहरवाली होती खटर-पटर .
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जीना है जो ख़ुशी से अच्छा अकेले रहना ,
''शालिनी ''चाहे मर्दों के यूँ न कटें पर .
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शालिनी कौशिक

3 टिप्‍पणियां:

अज़ीज़ जौनपुरी ने कहा…

बहुत ही सुन्दर और सार्थक रचना

दिगम्बर नासवा ने कहा…

माँ देती है औलाद को तहज़ीब की दौलत ,
मक्कारी से तुमने ही उनको किया है तर ...

सार्थक शेर हैं सभी ... अलग अंदाज़ के ,, कुछ कुछ कहते हुए ...

Admin ने कहा…

मैं इस कविता को पढ़ते हुए थोड़ा हंसा भी और थोड़ा चौंका भी। आपने रिश्तों की उम्मीद, शादी के बाद बदलती हकीकत और घरेलू टकराव को सीधी भाषा में रख दिया। तंज तीखा है, मगर भावनाएँ साफ़ दिखती हैं। कहीं-कहीं बात एकतरफ़ा लगती है, फिर भी आप समाज की सच्चाइयों पर उंगली रखते हैं।