मंगलवार, 4 जून 2013

" भक्त,भक्ति और भगवान "

सुश्री शांति पुरोहित की कहानी " भक्त,भक्ति और भगवान "







'बधाई हो, दया बहन ,आज आपके घर मे लक्ष्मी आई है |, वीणा बहन ने खुश होकर दया बहन को बधाई दी |  'सच मे बहुत ख़ुशी की बात है कि आज हमारे घर लक्ष्मी का आगमन हुआ है,मै बहुत ख़ुशी मेहसूस कर रही हूँ |' 'ना, जाने लोग बेटी के जन्म जाने पर क्यों नहीं खुश होते,इसके विपरीत बेटे के जन्म पर बहुत ख़ुशिया मनाते है ?' दया ने चिंता करते हए कहा | 'ऐसा भाव रखना उनकी ओछी मानसिकता को ही दर्शाता है |' वीणा बहन ने कहा |
                       दोनों सहेलिया बाते कर रही थी,तभी अंदर से दया बहन की छोटी बहु प्रिया जल-पान लेकर कमरे मे उपस्थित हुई | ''नमस्ते आंटी, बहु ने वीणा बहन को नमस्ते किया,जल-पान रख कर बाहर चली गयी |चाय पीते हुए दया बहन ने कहा 'अगले महीने बच्ची का नामकरण संस्कार है,मैंने बहुत बडा आयोजन रखवाया है| तुम पूरे परिवार को लेकर जरुर आना |' वीणा बहन अपने घर चली गयी |
                        इतना बड़ा आयोजन, और अपनी बेटी ,का इतना सम्मान देख कर बहु के मम्मी-पापा बहुत खुश हुए | ख़ुशी से उनकी आँखे भर आयी थी |
                          समय बीतता रहा,आज राधिका तीन साल की हो गयी थी | वो जब दो साल की थी,तभी से अपनी दादी दया बहन के साथ पूजा-घर मे बालकृष्ण की पूजा के लिए बैठने लगी थी,और छोटी-छोटी बाल चेष्टा करने लगी थी | दया बहन को बहुत आश्चर्य हुआ, जब राधिका उनके आने से पहले पूजा की सभी तैयारी कर देती थी | इतनी कम उम्र मे राधिका की भगवान के प्रति आस्था और सेवा-भावना देख कर दया बहन को बहुत हैरानी हुई |
                             तीन साल की राधिका अपनी दादी से ज्यादा बालकृष्ण की आराधना मे लग गयी | ये सब देख कर उसके पापा ने दया बहन से कहा ''माँ राधिका को अब स्कूल जाना होगा,अगले माह स्कूल खुलने वाला है | ये कैसे पढेगी,इसका सारा टाइम और सारा ध्यान तो पूजा घर मे ही लगा रहता है |'
                                 पापा की ये चिंता, उस वक्त ख़ुशी मे बदल गयी जब राधिका ने पहले ही साल मे क्लास मे सबसे ज्यादा मार्क्स ला कर प्रथम स्थान पर अपना कब्ज़ा किया | ख़ुशी उस वक्त दुगुनी हो गयी, जब स्कूल से ''हेड -मिस्ट्रेस का फोन आया ''आपकी राधिका ने क्लास मे ही नहीं बल्कि चारो सेक्शन मे प्रथम स्थान पाया है,बहुत बधाई , राधिका का भविष्य उज्वल हो | हमे राधिका पर गर्व है |
                              राधिका को अब बालकृष्ण की आराधना करने से कोई नहीं रोकता | सुबह चार उठ कर नित्य क्रिया-क्रम से निवृत होकर, अपने आराध्य के चरणों अपने आप को स्कूल जाने पहले समर्पित कर देती थी | स्कूल से वापस आकर,अपना होम वर्क पूरा करना,माँ को शाम का खाना बनाने मे उनकी मदद करना,फिर सेवा मे लग जाना बस यही रूटीन बन गया था |
                             समय कब पंख लगा कर उड़ जाता है पता ही नहीं चलता | राधिका ने स्कूल टॉप किया,कॉलेज की पढाई पूरी करी | राधिका के मन मे प्रशासनिक अधिकारी बनने का सपना मन मे सालो से पनप रहा था | इसके लिए तैयारी करने के लिए राधिका को दिल्ली जाना पढ़ा |
                                 आखिरकार आज राधिका ''प्रशासनिक अधकारी''बन गयी |आज घर मे उत्सव का सा माहौल है | दया बहन आज बहुत खुश है,सारी कॉलोनी,को भोजन का निमंत्रण दिया है | सभी गण-मान्य लोगो ने राधिका को आशीर्वाद के साथ-साथ उपहार भी दिया |
                              'दया ने अपने बेटे रविकिशन को,राधिका की शादी के लिए रिश्ते देखने की सलाह दी | कितने रिश्ते देखे पर किसी ने हां नहीं कहा | सब ने एक ही आशंका व्यक्त की, कि आपकी बेटी कृष्ण आराधना मे लीन रहती है | उसमे वैराग्य, की भावना कब उत्पन्न हो जाये इसका कोई ठिकाना नहीं है हमे अपने बेटे की शादी करके हमारे वंश को आगे बढ़ाना है | ना की राधिका से शादी कराके चिंता मोल लेनी है |
                              घर वालो के सामने बहुत बड़ी समस्या कड़ी हो गयी,पर राधिका उनको कहती कि आपलोग मेरी शादी की बिलकुल भी चिंता ना करे | बालकृष्ण को सब पता है कब क्या करना है | एक साल की ट्रेनिंग भी पूरी हो गयी |
                              ''कल राधिका को देखने लडके वाले आ रहे है| सब तैयारी आज ही कर लेना |' उसके पापा ने कहा | आखिकार राधिका की शादी तय हो गयी | अगले माह धूम-धाम से शादी हो गयी | ससुराल मे खूब स्वागत हुआ| सास-ससुर ने बेटे-बहु को चार दिन बाद ही शिमला दस दिन घुमने के लिए भेजा |शादी को तीन महीने ही हुए थे,कि सास को पोता चाहिए की डिमांड शुरु हो गयी | अभी तक राधिका की पोस्टिंग होनी बाकी थी,पति से दबाव डलवाया जाने लगा | राधिका एक साल के बाद बच्चा चाहती थी | अब घर मे सब उससे कटे-कटे से रहने लगे,तो वो अपने माँ-पापा के घर रहने आगयी |
                             दो महीने गुजर गये इसी दौरान राधिका की पोस्टिंग भी हो गयी | एक दिन राधिका की सास और पति उसके माँ-पापा के घर उसे वापस लेजाने के लिए आगये | माँ के समजने पर वो उनके साथ ससुराल आगयी | एक साल बाद राधिका के बेटा पैदा हुआ | घर मे जश्न का माहोल था | सास राधिका के पास आयी और उससे कहा ''बहु हमे माफ़ कर देना, हम भी तुम्हारी बालकृष्ण के प्ररि इतनी सेवा भावना देख कर चिंतित थे | तुम्हारे साथ किये ओछे व्यवहार के लिए माफ़ करना |' ''आप नाहक ही चिंतित हुए,मेरे बालकृष्ण मेरे साथ कोई अनहोनी कभी नहीं होने देते है |' राधिका ने सास से कहा |
                           ''क्या तम्हे, कभी अपने बालकृष्ण के दर्शन हुए है ? सास ने कहा | हां कई बार हुए है,कहा राधिका ने | ''कभी हमे भी दर्शन करवा सकती हो ?' कहा सास ने | हां , आप भी करना | जन्माष्टमी आने वाली है,इस दिन दर्शन होते है | आप भी करियेगा | ' राधिका ने कहा |
                              आज जन्माष्टमी है,राधिका ने ऑफिस की छुटी ली और पुरे दिन से कान्हा के जन्दीन की तैयारी मे जुटी हुई है | सास भी बरोबर साथ दे रही है | बालकृष्ण के लिए नये वस्त्र,नया श्रंगार,नया झुला और भोग-सामग्री सब बन गये | ठीक बारह बजे जन्म के समय राधिका ने सास को कहा माँ ,आओ दर्शन करो | पर सास को कोई दर्शन नहीं हुए,बस बंसी की मधुर धुन सुनाई दे रही थी | राधिका को बाल-रूप के दर्शन हुए | सास ने कहा '' हम धन्य हुए आज तुम्हारे कारण,कान्हा की बंसी की धुन सुनी | कभी दर्शन भी होंगे |सास ने अपनी गलती मानी की हमने तुम्हारी भक्ति को शक की नजर से देखा , हमे माफ़ करना | राधिका ने सास को गले से लगाया और कहा '' आप माता-पिता हमारे लिए पूजनीय हो माफ़ी हमसे नहीं कान्हा जी से मांगो | और दोनों की आँखों मे आंसू थे |
                                                                                                  शांति पुरोहित
                       

सोमवार, 3 जून 2013

सूरत पे मेरी चाँद नज़र आता है अब भी क्या ?

Old muslim couple Royalty Free Stock PhotosCartoon of Muslim Man & Woman Stock Image

बीवी ने पूछा मियां से आँखें झपक-झपककर ,
सूरत पे मेरी चाँद नज़र आता है अब भी क्या ?
शौहर ने कहा प्यार से आँखें मसल-मसलकर ,
ऐनक बिना लगाये मुझे दिखता ही है कहाँ .

बीवी ने कहा आपने ये वादा था किया ,
लाओगे तोड़ तारे मेरे लिए यहाँ .
शौहर ने कहा टूट गयी मेरी कमर ही अब ,

कमरे से बाहर जाना भी मुश्किल है जाने जाँ .

बीवी ये बोली टेलीफोन घर में एक लगा लो ,
बच्चों से यहीं बैठके मैं बातें करूंगी .
शौहर ने कहा बातें तेरी मुझको हैं खाती ,

बच्चों के दिमागों को क्यूं करती हो फ़ना .

शौहर ने कहा जाओ अब रोटी दो बना दो ,
फाकाकशी में जान कहीं निकल न जाये .
बीवी ने कहा हाथों में मेरे जान नहीं अब 
जाओ मिटाओ भूख अपनी ढाबे में मियां .


       शालिनी कौशिक 
           [WOMAN ABOUT MAN]

रविवार, 2 जून 2013

एक नई दिशा

सुश्री शांति पुरोहित की कहानी    एक नई दिशा    





                                                                                                                                        अचानक रात को ग्यारह बजे माँ के कराहने की आवाज आई ,मै तुरंत उनके कमरे मे गयी | वहां का द्रश्य देख कर मे घबरा गयी | ' माँ पसीने नहायी हुई और बेहोश होगयी थी | पडौस मे रहने वाले 'शर्मा अंकंल को बुलाने के लिए मै उनके घर गयी |दरवाजा खुलते ही मैंने कहा 'अंकल माँ को कुछ हुआ है,आप चलिए मेरे साथ उनको अस्पताल ले जाना है |' अस्पताल पहुँचते ही डॉ. ने उन्हें आई .सी .यू. मे एडमिट कर कर लिया |
                               माँ को दिल का दौरा पड़ा था | डॉ.के प्रयास और दवाइ के असर से माँ को सुबह तक थोडा आराम आया,तो मै घर चली गयी | घर मे मै और माँ दो ही जन थे | पापा का चार साल पहले देहांत तेज सुगर के कारण उनके ऑफिस मे ही हो गया था | रिटायर होने मे पांच साल और बाकी थे | अब उनकी जगह पर भाई को राज्य सरकार ने अनुकम्पा नौकरी दी है | हम इस शहर मे नए है,भाई ऑफिस टूर के लिए दस दिन के लिए उदयपुर गये हए थे | 
                             सुबह नर्स आयी इंजेक्शन  लगाने के लिए मुझे उठाया | 'आपके साथ मे कौन है, ये दवा मंगवानी है |' नर्स ने कहा | 'सिस्टर अभी कुछ ही देर मे मेरी बेटी आने वाली है |' दवाओ के असर से आँखे नींद से बोझिल थी,बस इतना कह कर मै वापस सो गयी | फिर दो घंटे बाद नर्स आयी,उसने सोचा, मै सो रही हूँ तो वापस चली गयी, मै तो ऐसे ही आँखे बंद करके लेटी हुई थी |
                            घर के जरुरी काम करके और मेरा खाना लेकर मेरी बेटी रश्मि आ गयी थी | उसने मुझे खाना खिलाया,फिर आराम से लिटा दिया | 'मैंने उसे मेरे बेटे राज को फोन करने से मना कर दिया, बेकार मे वो चिंता करता और अपना काम छोड़ कर यहाँ आ जाता | मुझे तो डॉ. ने दस दिन तक अस्पताल मे रहने को कह दिया था |' दोपहर को नर्स आयी, मुझे सुबह की दवाई देकर कहा 'आंटी जी अब कैसी तबियत है ?' मै कुछ नहीं बोली बस मुस्करा रही थी | मुझे मुस्कराता देख वो बोली 'क्या हुआ आंटी आप ठीक हो ना |' 'मुझे ऐसा क्यों लगता है जैसे मैंने तुम्हे कहीं देखा है |' मैंने उसे कहा | 'एक जैसे चेहरों से दुनिया भरी पड़ी है | तभी ओ.पी डी.मे से सिस्टर  मौली का नाम पुकारा जाने लगा और वो बात बीच मे छोड़ कर भागी | मै वापस सोने का उपक्रम करने लगी |
                            जब मेरी शादी हुई, पति सरकारी नौकरी में थे,मै ''टीचर ट्रेनिग'' कर रही थी | समय के कब पंख लग गये पता ही नहीं चला | मै दो बच्चो की माँ बन गयी ! राज और रश्मि स्कूल जाने लगे,तभी एक दिन पोस्ट मैन मेरा जोइनिंग लेटर लेकर आया | घर मे मेरी नौकरी लगने से सब खुश थे,बस मे खुश नहीं थी | बच्चो से दूर रहना पड़ेगा ये सोच कर ही मे घबराने लगी | मेरी पोस्टिंग राजस्थान के गाँव पांचू मे हुई,वहां मुझे अकेले ही रहना था ये सोच कर मै दुखी थी |
                             'मेरा दुःख ख़ुशी मे तब बदल गया, जब मेरे ससुर अपना सामान लेकर मेरे साथ चलने को तैयार खड़े थे | ' वहां स्कूल के ही पास हमने किराये का एक घर लिया,घर के काम के लिए एक बाई भी रखली |बाई अपनी बेटी को साथ लेकर आती थी | वो लड़की इतना चपर-चपर करती कि मेरे तो सर मे दर्द हो जाता था | एक बार मैंने मेरी बाई माया को कहा '' अपनी बेटी को स्कूल क्यों नहीं भेज देती,वहां जाएगी तो  कुछ पढना लिखना सीख जाएगी तो भविष्य मे इसके बहुत काम आएगा |' सुनकर पहले तो कुछ नहीं बोली फिर कहा 'कहाँ से पैसा लाऊ ,इसे पढ़ाने का ,दिन भर खटती हूँ ,तब पेट भरने जितना पैसा कमा पाती हूँ |'
                           'सरकारी स्कूल है, ज्यादा खर्चा नहीं होगा,फिर तुम फ़िक्र मत करो मै सारा खर्चा वहन करुँगी | अगले ही दिन से बाई की बेटी मौली स्कूल आने लगी | स्कूल मे मौली का मन पढने से ज्यादा बाते करने मे ज्यादा लगता था | गाँव मे किसके घर मे शादी है,किसके घर मे बच्चा आने वाला है वो सब जानकारी रखती थी | पौडर,क्रीम और काजल के बिना वो कभी स्कूल नहीं आती थी | 'तुम अपना सारा ध्यान इधर-उधर लगाती रहोगी तो पढ़ोगी कब |' मैंने उसे डांटते हुए कहा | मौली हाजिर जवाब तो थी,तुरंत कहा 'मैडम मै पढ़-लिख कर कॉलेज की लेक्चरार बनुगी ,आप देखना मै जरुर बनुगी |मै शादी करके बच्चो को नहीं पालूंगी |'
                           'मौली ने दसवी पास कर ली थी | मै आश्वस्त थी कि मौली ने जो कहा वो करके रहेगी इसी बीच मेरा ट्रांसफर हो गया,मै वो गाँव और मौली सब को भूल कर अपने काम मे व्यस्त हो गयी | समय बीतता रहा | शाम को जब सिस्टर आयी तो मैंने फिर वही सवाल दोहराया तो वो अपने को रोक नहीं सकी और रो पड़ी |, मैंने उसे कुछ देर रोने दिया | 'मैडम आपने मुझे अब तक नहीं पहचाना,मै तो आपको देखते ही पहचान गयी पर आपको बता कर दुखी नहीं करना चाहती थी |' 'क्या हुआ तुम कॉलेज लेक्चरार बनी नहीं,नर्स कैसे बन गयी |' मैंने उससे पूछा | ' हायर सेकंडरी पास करते ही माँ ने मेरी शादी मेरे से ज्यादा उम्र के आदमी के साथ करा दी | मैंने इसे अपनी किस्मत समझ कर स्वीकार कर लिया,पर मेरी किस्मत मे इससे भी ज्यादा बुरे दिन देखने लिखे थे | मेरे पति के एक पत्नी पहले से ही थी| बच्चा नहीं था इसलिए मुझसे बच्चा पाने के लिए दूसरी शादी की वो भी हमे धोखे मे रख कर |' इतना कह कर वो फिर रोने लगी ,अपने आपको सम्भाल कर फिर कहा 'ये सब मै बर्दाश्त नहीं कर सकी, अपने जीवन को एक नई दिशा देने के लिए मै वहां से वापस अपने घर आ गयी|
                             'पति को तलाक दे कर दीन- दुखियो की सेवा करने के लिए नर्स की ट्रेनिग कर के अस्पताल मे मरीजो की सेवा करना ही अब मेरे जीने का उद्देश्य बन गया है |और मै बहुत खुश हूँ | आज आप मिल गये मै बहुत खुश हूँ | इतना कहकर मौली चुप हो गयी और मेरी गोद मे सर रख कर सो गयी थोड़ी देर |
                               दस दिन तक अस्पताल मे मौली ने मेरी बहुत सेवा की | आज मुझे डिस्चार्ज मिलने वाला था | सुबह से मौली बहुत उदास दिख रही थी | घर जाने से पहले मैंने उसे अपने पास बिठा कर कहा 'तुम अब अकेली नहीं हो ,जब भी मन करे आ जाना |,तुम्हारा अपना घर है तुम आओगी तो मुझे अच्छा लगेगा |' हम दोनों के साथ सब लोगो की आँखो से आंसू बहने लगे |
                                                                                                                  शांति पुरोहित

शुक्रवार, 31 मई 2013

'आदमी शादी के बाद ...............न घर का न घाट का .............''


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''शादी करके फंस गया यार ,
    अच्छा खासा था कुंवारा .''
भले ही इस गाने को सुनकर हंसी आये किन्तु ये पंक्तियाँ आदमी की उस व्यथा का चित्रण करने को पर्याप्त हैं जो उसे शादी के बाद मिलती है .आज तक सभी शादी के बाद नारी के ही दुखों का रोना रोते आये हैं किन्तु क्या कभी गौर किया उस विपदा का जो आदमी के गले शादी के बाद पड़ती है .माँ और पत्नी के बीच फंसा पुरुष न रो सकता है और  न हंस सकता है .एक तरफ माँ होती है जो अपने हाथ से अपने बेटे की नकेल निकलने देना नहीं चाहती और एक तरफ पत्नी होती है जो अपने पति पर अपना एक छत्र राज्य चाहती है .
    आम तौर पर भी यह देखने में आया है कि लड़के की शादी को तब तक के लिए टाल दिया जाता है जब तक उसकी बहनों का ब्याह न हो जाये क्योंकि एक धारणा यह भी प्रबल है कि लड़का शादी के बाद पत्नी के काबू में हो जाता है और फिर वह घर का कुछ नहीं करता जबकि जब अपनी लड़की को ब्याहते हैं तो ये चाहते हैं कि लड़का अपनी पत्नी का मतलब उनकी बेटी का हर तरह से ख्याल रखे और उसे कोई भी कष्ट न होने दे ,किन्तु बहु के मामले में उनकी सोच दूसरे की बेटी होने के कारण परिवर्तित हो जाती है कोई या यूँ कहूं कि एक माँ जो कि सास भी होती है यह नहीं सोचती कि शादी के बाद उसकी अपनी भी एक गृहस्थी है और जिसके बहुत से दायित्व होते हैं जिन्हें पूरा करने का एकमात्र फ़र्ज़ उसी का होता है .
    और दूसरी ओर जो उसकी पत्नी आती है वह अपने भाई से तो यह चाहती है कि वह मम्मी पापा का पूरा ख्याल रखे और भाई की पत्नी अर्थात उसकी भाभी  भी मेरे मम्मी पापा को अपने मम्मी पापा की तरह समझें और उनकी सेवा सुश्रुषा में कोई कोताही न बरतें और स्वयं अपने सास ससुर को वह दर्जा नहीं दे पाती ,ऐसे में माँ और पत्नी की वर्चस्व की जंग में पिस्ता है आदमी ,जो करे तो बुरा और न करे तो बुरा ,जिसे भुगतते हुए उसे कहना ही पड़ता है -
        '' जब से हुई है शादी आंसूं  बहा रहा हूँ ,
          मुसीबत गले पड़ी है उसको निभा रहा हूँ .'' 
                   
                         शालिनी कौशिक 
                      [WOMAN ABOUT MAN]

रविवार, 19 मई 2013

बस यही कल्पना हर पुरुष मन की .



अधिकार 
सार्वभौमिक सत्ता 
सर्वत्र प्रभुत्व 
सदा विजय 
सबके द्वारा अनुमोदन 
मेरी अधीनता 
सब हो मात्र मेरा 

कर्तव्य 
गुलामी 
दायित्व ही दायित्व 
झुका शीश 
हो मात्र तुम्हारा 
मेरे हर अधीन का 

बस यही कल्पना 
हर पुरुष मन की .

शालिनी कौशिक 
   

सोमवार, 13 मई 2013

''कायर होता जा रहा है आदमी ''



दरिंदा है मनोज, अपनी पत्नी से भी किया था रेप   

'गुड़िया' खतरे से बाहर, आरोपी ने कबूला गुनाह   

 

झुलसाई ज़िन्दगी ही तेजाब फैंककर ,   

 

acp slapped girl in delhi

''कायर होता जा रहा है आदमी ''
दिल्ली में एक पञ्च वर्षीय बालिका से गैंगरेप ,शामली में चार सगी बहनों पर तेजाब उडेला ,मायके गयी पत्नी तो जल मरा ,महिला से छेड़खानी मारपीट ,रामपुर में अज़ीम नगर थाना क्षेत्र में सामूहिक दुष्कर्म के बदले सामूहिक दुष्कर्म ,मोदीनगर में कैथवादी में पानी भरने गयी छात्रा से छेड़छाड़ कपडे फाड़े आदि आदि आदि दिल दहल जाता है मन क्षुब्ध हो जाता है रोज रोज ये समाचार देखकर पढ़कर किन्तु नहीं रुक रहे हैं ये और नहीं मिल पा रहा है कोई समाधान  इन्हें रोकने का .पुरुष जो नारी को अपने से दोयम दर्जा समाज में ,इस सृष्टि में प्रदान करता है और उसके संरक्षण का दायित्व अपने ऊपर लेता है .वही पुरुष आज बात बात पर स्त्री पर हमले कभी यौनाचार ,कभी तेजाब उडेलना कभी मारपीट करना आदि के रूप में करने लगा है और वह भी उस देश में जहाँ नारी की पूजा की जाती है ,जहाँ कहा जाता है -
''यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते ,रमन्ते तत्र देवता .'' 
       विभिन्न धर्मग्रंथों में नारी का सम्मान ,सुरक्षा का दायित्व पुरुषों को दिया गया है -
-मनुस्मृति के ८/३४९ में कहा गया है -नारी और ब्राह्मण की रक्षा करने के लिए धर्मयुद्ध में किसी को मारना पड़े तो भी दोष नहीं होता है .
-नारी के सम्बन्ध में अन्य स्मृतियाँ कहती है -
         ''जो लोग नारी जाति  से घृणा करते हैं ,समझना चाहिए कि वे अपनी माता का ही अपमान करते हैं .जिस पर नारी की कोप दृष्टि है उस पर भगवान का भी अभिशाप लगा हुआ है .जिस दुष्ट के व्यवहार से नारी की आँखों से आंसू बहते हैं वह देवता के क्रोधानल से भस्म हो जाता है .जोव्यक्ति नारी के दुःख दर्द में उसकी हंसी उडाता हैं उसका अकल्याण होता है .ईश्वर  भी उसकी प्रार्थना नहीं सुनते . ''
 बचपन से युवावस्था हो या प्रौढ़ावस्था नारी सम्मान और संरक्षण संस्कारों के रूप में पुरुषों को पहनाया जाता है अनार्य और संस्कारों से दूर परिवारों का तो नहीं पता किन्तु सभ्य सुसंस्कृत परिवार अपने बच्चों को इसी तरह के आभूषणों  से विभूषित करते हैं और अपने परिवार के पुरुषों पर महिलाओं के सम्मान व् संरक्षण का भार सौंपते है .रक्षा बंधन का पर्व मनाया तो हिन्दू धर्मावलम्बियों द्वारा जाता है किन्तु उसके कच्चे धागे का मान मुसलमान भी रखते हैं .रानी पद्मावती की राखी पर हुमायूँ का आना सभी जानते हैं .नारी को परिवार की समाज की इज्ज़त माना जाता है और आज यही मान्यता नारी के जीवन के लिए खतरा बन चुकी है क्योंकि आदमी में जो प्रतिशोध की भावना है उसका शिकार नारी को ही होना पड़ रहा है .प्यार और वह भी एकतरफा अगर लड़की ने स्वीकार नहीं किया तो या तो उसे बलात्कार का शिकार होना पड़ता है या फिर तेजाब से झुलसना पड़ता है .
     छेड़खानी ,जिसका आमतौर पर सभी महिलाएं शिकार होती हैं चुपचाप सहना इसे अपनी नियति मान रहती हैं किन्तु यदि कोई इसका शेरनी बन प्रतिरोध कर देती है तो इससे भी पुरुष के पौरुष को चोट पहुँचती है जबकि वह जानता है कि वह गलत कर रहा है तब भी यह नहीं सोच पाता कि ज़रूरी नहीं है कि आज की नारी भी बरसों से चुपचाप रहने वाली कोई गुडिया नहीं होगी और जब वह नारी का शेरनी रूप देखता है तो जो ढंग वह उससे निबटने के लिए आजमा रहा है वे उसकी कायरता की ही गवाही दे रहे हैं .वह अपने गलत काम के लिए माफ़ी नहीं मांग रहा ,शर्मिंदा नहीं हो रहा बल्कि महिला के साथ मारपीट को उतारू हो रहा है और इस श्रेणी में वह किसी भी महिला की उम्र का अंतर नहीं कर रहा है उसका यह व्यवहार चाहे दो साल की मासूम हो या ६० साल की वृद्धा सबके साथ ही नज़र आ रहा है .पहले जहाँ  महिलाओं के ,लड़कियों के अपहरण की घटनाएँ न के बराबर ही सुनने में आती थी ,आज निरंतर बढती जा रही हैं .पहले जहाँ लोगों के आपसी झगड़ों में महिलाओं को , लड़कियों को एक तरफ कर दिया जाता था आज बर्बरता का शिकार बनाया जा रहा है .
    प्रतिशोध की भावना में झुलसता आदमी ,हार का दंश झेलता आदमी आज इतना गिर गया है कि प्राकृतिक रूप से ताकत में अपने से कमजोर बनायीं गयी नारी पर ज़ुल्म करने पर आमादा हो गया है .
    लड़कियां परिवार  की इज्ज़त होती हैं ,लड़कियां शरीर से कोमल होती हैं ,लड़कियां मेहनती होती हैं ,वे पराया धन होती हैं ,परिवार में सबकी प्रिय होती हैं आदि आदि आदि सभी बातें आज उनके खिलाफ ही जा रही हैं .किसी परिवार की इज्ज़त ख़राब करनी हो तो उसकी बहु बेटी से बलात्कार करो ,किसी लड़की ने यदि एकतरफा प्यार का प्रस्ताव ठुकरा दिया तो उसे उसके सौंदर्य का घमंड मान तेजाब से झुलसा देना आज आम प्रतिक्रिया हो गयी है किसी को समाज में मुहं दिखने के काबिल न छोड़ना हो तो उसके साथ दुष्कर्म करो ,काम वासना को पूरी करना हो तो लड़की के साथ हैवानियत करो और यदि वह न मिल पाए तो ऐसे में ये कायर पुरुष आज छोटे मासूम लड़कों को भी शिकार बनाने से नहीं चूक  रहे हैं .अपनी एक से बढ़कर एक कुत्सित इच्छाओं को पूरी करने के लिए ये कुछ भी कर सकते हैं और इस सबके बाद अपनी पहचान छिपाने के लिए अपने शिकार की हत्या और सभी कुछ इतना आसान कि क्या कहने ?लड़की में इतने बलशाली पुरुषों ,हैवान जानवरों का सामना करने की हिम्मत ही कहाँ ?वह तो इस सबके बाद भी दोषी न केवल समाज की नज़रों में बल्कि अपनी स्वयं की नज़रों में और इसका परिणाम भी आज दिखाई दे रहा है लड़कियां स्वयं को मौत के हवाले कर रही हैं ,कहीं तेजाब पी कर तो कहीं आग में झुलस कर .
    लड़कियों की तो नियति पुरुषों ने यही बना दी है जिसके कारन कन्या भ्रूण हत्या तक को लोग अंजाम देते हैं क्योंकि ऐसी घटनाएँ देख हर किसी में हिम्मत नहीं है कि वह लड़कियों को पैदा होते देख सके नहीं दे सकते वे अपने लड़के को ऐसे संस्कार जिनसे ऐसी घटनाएँ घटित ही न हों और परिणाम स्वरुप पुरुषों का परचम लहराता रहता है ,अभिमान बढ़ता जाता है और आज यही अभिमान है जो हैवानियत में तब्दील हो गया है और पुरुष को कायरता की ओर बढ़ा रहा है .
      शालिनी कौशिक
 [woman about man ]

गुरुवार, 9 मई 2013

अनमोल पल - शांति पुरोहित


  अनमोल पल                                                                                                                                                 आज उर्मि अपने अतीत की खट्टी- मीठी यादो मे खोई हुई है,'उमेश ऑफिस चला गया वो  बैठ गयी | सोच रही है कि कालेज के कितने सुहावने दिन थे कितनी मस्ती करते थे |                  
                       कालेज मे उसके बहुत सारे दोस्त थे,  सब दोस्त सैर करने जाया करते थे | उर्मि गाना बहुत अच्छा गाती थी ये उन सब को पता था | कालेज के हर उत्सव मे उर्मि गाती थी | जब भी वो  लोग पिकनिक जाते तो सब दोस्त उर्मि से गाना जरुर गवाते थे |
                          कालेज का कोई भी उत्सव उसके गाने के बगैर समाप्त नहीं होता था | वैसे तो सबको उसका गाना पसंद था पर एक लड़का जिसका नाम तक वो  नहीं जानती क्योंकि वो सीनियर स्टूडेंट जो था | उसे उर्मि का  गाना- गाना बहुत पसंद था | उर्मि के किसी भी प्रोग्राम को छोड़ता नहीं बस | उर्मि को  उसके बारे मे कुछ जानने की इच्छा हुई | उसने वंशिका से उसके बारे पता किया वो उसकी क्लास मे पढ़ती थी |
                            कालेज में सबने कहना शुरू कर दिया कि उमेश तुम्हे कितने ध्यान से सुनता है हमे तो लगता है ये उमेश जल्दी ही तुम्हे शादी के लिये प्रपोज करेगा | उर्मि उन सब को हलके से डांट देती थी | वैसे तो कभी उमेश ने बात नहीं की पर उस दिन कालेज का वार्षिक उत्सव था,उर्मि गाने की आखिरी बार रिहर्सल कर  रही थी कि तभी उमेश वहां आया और कहा''समय मिलते ही मुझसे पास के कॉफ़ी हाउस मे मिलना |, उमेश का इस तरह से अचानक कॉफ़ी हाउस मे बुलाना थोडा अजीब लगा | पर उसने जाने का तय किया \
                           कॉफ़ी हाउस मे उमेश पहले से ही बैठा था | उर्मि भी बैठ गयी | कुछ देर की चुपी तोड़ते हुए उमेश ने कहा ''उर्मि तुम बहुत अच्छी गायिका हो |'
'' धन्यवाद , मैंने कहा
'' क्या मै तुमसे दोस्ती कर सकता हूँ ?'
'' हाँ, क्यों नहीं ? उसने कहा |
 वो थोडा सहज हुआ ''मेरा नाम उर्मि है.....''..जानता हूँ , वो बोला ''इसी कालेज मे हूँ नाम तो सब को पता होगा ही  अब उर्मि और उमेश रोज ही मिलने लगे | अब उमेश नोट्स बनाने मे भी उर्मि की मदद कर देता था समय बीतता गया दोस्ती ने जब प्यार का रूप लेना शुरू किया तो उर्मि को लगा ये ठीक नहीं होगा | उमेश और उर्मि की आर्थिक परिस्थिती मे रात दिन का अंतर था वो अमीर बाप का बेटा और उर्मि गरीब बाप की बेटी | शादी अपने से बराबर वाले के साथ ही की जानी चाहिये |
                        एक दिन उमेश ने आकर कहा ''उर्मि ,मै तुमसे शादी करना चाहता हूँ ,उर्मि कुछ तय नहीं कर पारही थी | उसने फिर कहा ''क्या तुम नहीं चाहती ?''उर्मि ने ना बोला '' उर्मि गरीब बाप की बेटी थी  तो उमेश के माँ -पापा शायद उर्मि को पसंद ना करे | '' तुम मुझे पसंद हो,तुम्हारा गाना -गाना मुझे पसंद है |माँ -पापा को मै राजी कर ही लूँगा |उर्मि खुद भी उससे शादी करना चाहती पर कुछ तय नहीं कर पा रही थी |अब उर्मि चुप -चुप सी रहने लगी |एक बार वंशिका ने कहा ''उर्मि तुम्हे आजकल क्या हो गया तेरी सारी मस्ती कहाँ गायब हो गयी ?''
                         उर्मि ने अपने और उमेश के बारे मे सब कुछ वंशिका को बताया उसने उर्मी से कहा तुम्हारा
 मन जो कहता है वो करो और किसी की चिंता मत करो |आज उमेश उर्मि को पूछ रहा था कि उर्मि क्या सोचा तुमने तो उर्मि हंस कर वहां से भाग गयी |अब परीक्षा नजदीक थी उर्मि और उमेश तैयारी मे लग गये थे |
                         कालेज की छुट्टियों मे उर्मि और उमेश की शादी उमेश की माँ की मर्जी के खिलाफ हो गयी |उमेश की माँ को उर्मि पसंद नहीं थी वो अपने बेटे की शादी किसी अमीर घराने की लड़की से करना चाहती थी तो जाहिर सी बात है उनका उर्मि के साथ अच्छा व्यवहार तो नहीं हो सकता था बात -बात पर उर्मि को उसकी गरीबी का एहसास कराया जाता था, उमेश बहुत अच्छे थे पर माँ को कुछ नहीं कहते,|
                       एक बार तो सासूजी ने सारी हद पार करते हुए जो ताना दिया उर्मि को की वो चुप सी हो गयी उर्मि को अब गाना तो दूर की बात किसी से बात करना भी अच्छा नहीं लगता था | उमेश ने कई बार पूछा भी ''उर्मि तुमने गाना क्यों छोड़ दिया,कितनी अच्छी गायिका थी तुम जब तुम शादी करके आई? उर्मि बस उन्हें देखती रहती थी |  उसकी माँ के बारे मे बता कर माँ-बेटे मे दुरी पैदा नहीं करना चाहती थी |
                   एक दिन सासुजी ने उमेश को कहा ''उर्मि को नीचे लेकर आओ,मंदिर चलना है | उर्मि आई और वो  सब गाड़ी मे बैठ गये |उर्मि ने कुछ नहीं पूछा कि हम कहाँ जा रहे है किसी ने कहा होगा की मंदिर ले जाने से ठीक होगा | उमेश सारे रास्ते मेरे बारे मे सोचते रहे कि क्या हुआ है उर्मि को गाना तो दूर बोलती भी नहीं किसी से |
                    अचानक गाड़ी मनोरोग चिकित्सक के अस्पताल के आगे रुकि उर्मि समझ गयी कि उन्होंने उसे पागल समझ के रखा है |दोनों माँ-बेटे बाहर बैठ गये उर्मि डाक्टर के पास चली गयी | करीब दो घंटे बाद बाहर आई,डाक्टर ने उमेश और माँ को कुछ भी बताने से मना किया था | अब माँ-बेटे के समझ नहीं आ रहा था कि डॉ.और उर्मि के बीच क्या बाते हुई होगी |
                    रास्ते मे एक दुकान आई उर्मि ने कहा''जरा गाड़ी रोको,वो दुकान से एक डायरी खरीद कर लायी और कहा ''डॉ.ने कहा कि जो भी दिमाग मे आए वो इस डायरी मे लिखना | उमेश को अच्छा लगा पर सासुजी बडबडाई '' डायरी लिखने के लिये डॉ . के पास आने का इतना खर्चा किया ? उमेश ने मेरे हाथ पर अपना हाथ रखकर कहा ''तुम लिखना, रात को उर्मि तीन बजे तक लिखती रही | इस दौरान उमेश दो बार उठा उसे जगी हुई देख कर वापस सो गया | चार बजे उर्मि सो गयी तब उमेश फिर उठा और डायरी पढने लगा |''गरीब के घर मे पैदा होना गुनाह है,ये मैंने तब जाना जब मेरी सासुजी ने मझसे कहा कि ''तुम्हारे माता-पिता के पास पैसा नहीं था ,वे मुझसे गाना गवा कर कमाई करते थे | मेरा गाना उनकी कमाई का जरिया था | उनकी इस बात से मुझे बहुत टीस पहुंची और मैं खामोश हो गयी | मेरी कला का इतना अपमान ये मुझसे बर्दाश्त नहीं हुआ और उसी दिन से मैंने गाना छोड़ दिया | उमेश बहुत अच्छे थे पर माँ को कुछ नहीं कहते तो मझे उन पर गुस्सा आता था |
                         ये सब पढ़ कर उमेश की आँखों मे आंसू आ गये मे उर्मि को समझ ही नहीं पाया | दुसरे दिन उर्मि दवाई लेने के बाद घर के काम में लग गयी | सारे काम खत्म करके अपने कमरे मे उदास होकर लेट गयी अपनी आज की दशा पर सोचने लगी,तभी उमेश का फोन आया कि'' उर्मि, आज हम दोनों बाहरगाँव घुमने चलेंगे|ये सुनकर उर्मि ख़ुशी से रोने लगी|  शाम को उमेश ने'' माँ को कहा ''मै और उर्मि दो माह के लिये घुमने जा रहे है,आप छोटे भाई -भाभी को बुला लेना या उनके पास चली जाना |
                        मुझे उर्मि को गायिका बना कर ही लाना है | मैंने गाने की वजह से ही इसे चुना था और मेरी वजह से ही इसका गाना बंद हुआ जो अब मुझे इसे वापस देना है उर्मि की आँखों मे आंसू छलकने लगे| क्योंकि ये उसके जीवन के अनमोल पल थे |
                 
             शांति पुरोहित