तुम समय की धार थे, ठहरा हुआ पाषाण मैं|
न तुम रुके, न मैं बही, सजीव तुम, निष्प्राण मैं |
कण-कण घुली, रज-रज बनी, हो सूक्ष्म मैं तुममें मिली,
मिटने में थी मेरी पूर्णता, सम्पूर्णता तेरे संग चली,
अस्तित्व की कब चाह थी, तुझसे मेरी पहचान थी
न हुई पृथक न विलीन हुई तुममें, अनस्तित्व का प्रमाण मैं|
अदृश्य तुम जग के लिए, मैं मूर्त हो बंधन बँधी ,
स्पर्श तेरा था अदृश्य, मैं दृश्य हो हर क्षण दिखी,
मेरे अणु-अणु का रीतना, कण-कण हरेक क्षण छीजना ,
निर्मोही तुम अविकल रहे, अनुदिन घटी परिमाण मैं |
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शालिनी रस्तौगी