रविवार, 10 मार्च 2013

''एक हल्की बात कर देती है किरदार तार-तार !''

 ये पोस्ट पूर्व में एक पुरुष ब्लोगर की टिप्पणी पर प्रकाशित की थी -

''एक हल्की बात कर देती है किरदार तार-तार !''

ब्लॉग जगत अपने मूल स्वरुप में बुद्धिजीवियों का समूह है .ब्लॉग जगत में ऐसी हल्की बात की उम्मीद कोई भी सभ्य-सुशिक्षित ब्लोगर नहीं कर सकता है .ब्लोगर स्त्री है या पुरुष -क्या आप यह देखकर किसी के ब्लॉग पर जाते हैं ?आप ब्लॉग पर पोस्ट की गयी रचना-आलेख पर ध्यान देते हैं या प्रोफाइल में चिपकी ब्लोगर की फोटो पर ? मेरा मानना है कि कोई भी सभ्य ब्लोगर सिर्फ पहचान के लिए प्रोफाइल फोटो पर एक नज़र डाल लेता है .ऐसे में यदि कोई आपको बार-बार यह सलाह दे कि आप ब्लॉग पर अपने प्रोफाइल में ''अच्छी फोटो ''लगायें इससे पाठकों की संख्या बढती है तो इसे आप क्या सलाह देने वाले के दिमाग का दिवालियापन नहीं कहेंगे !
जो पाठक आपकी रचनाओं के स्थान पर आपकी फोटो पर ज्यादा ध्यान देते हैं -वे पाठक हैं ही कहाँ ?वे तो दर्शक हैं .उनके लिए तो बहुत सामग्री नेट पर अन्यत्र भी उपलब्ध है .ऐसे ब्लोगर न तो साहित्य प्रेमी कहे जा सकते हैं और न ही विशुद्ध आलोचक .वे केवल तफरी करने के लिए ब्लॉग बना कर बैठ गएँ हैं .ब्लॉग जगत में सुन्दर चेहरों को फोटो में तलाशने का उद्देश्य रखने वाले ऐसे ब्लोगर्स को यह जान लेना चाहिए कि यदि ब्लॉग को प्रसिद्द करने का यही तरीका होता तो न तो अच्छा लिखने वालों को कोई पूछता और न ही उम्रदराज ब्लोगर्स को जबकि ब्लॉग जगत में दोनों की ही महत्ता सिर चढ़ कर बोल रही है .
यदि सुन्दर फोटो लगाकर कोई ब्लॉग जगत में अपनी पाठक संख्या बढाने का ख्वाब देखता है तो यह केवल दिवास्वप्न ही है क्योंकि यदि ऐसा होता तो यहाँ भी फ़िल्मी हीरो-हिरोइन -मॉडल का बोलबाला हो चुका होता.इसके पीछे कारण यही है कि आम आदमी न तो उनकी तरह अपनी शारीरिक सुन्दरता को लेकर सचेत होता है और न ही उसके पास इन की तरह शरीर को सुन्दर-सुडोल बनाने का समय व् पैसा होता है .फिल्म-मॉडलिंग से जुड़े लोग अपने शरीर को दुकान के माल की तरह सजा-सवाँर कर रखते हैं क्योंकि यह उनके पेशे का हिस्सा है पर यहाँ ब्लॉग जगत में हम सभी का उद्देश्य मात्र अपने विचारों और भावों को अपने सामान आम लोगों तक संप्रेषित करना है व् अन्य ब्लोगर्स के विचारों से अवगत होना है .वास्तव में जो किसी को ऐसी घटिया सलाह देता है वह सबसे पहले किसी की निजता को चोट पहुंचाता है फिर सभ्यता की सीमाओं को लांघता है और इस सबके बाद वह स्वयं विचारकर देखे कि वह कितनी हल्की बात कर रहा है ! इससे उसका किरदार भी तो तार-तार हो जाता है .क्या ऐसा नहीं है ?

9 टिप्‍पणियां:

शालिनी कौशिक ने कहा…

sahi kah rahi hain aap.

Asha Saxena ने कहा…

मैं आप की बात से पूर्ण रूप से सहमत हूँ पुरुष और महिला पूरे जीवन काल में एक दूसरे के सहयोगी होते हैं अतः महत्त्व तो किसी का कम नहीं होता पर अपना अपना नजरिया है कोइ क्या सोचता है |
आशा

डा. श्याम गुप्त ने कहा…

सही कथन ...

रेखा श्रीवास्तव ने कहा…

बिलकुल सही बात है , सिर्फ तस्वीर देख कर ब्लॉग अहमियत देने वाले कहीं से भी बुद्धिजीवी नहीं कहे जाएंगे। फिर कुछ लोगों की सोच को कुछ कहा तो नहीं जा सकता है. एक सवेदनशील व्यक्ति अगर लिखता है तो उसका सिर्फ लिखने वाले के भावों और उसकी लेखनी से निकले हुए शब्दों पर ही ध्यान केन्द्रित होता है .

Sarika Mukesh ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
Sarika Mukesh ने कहा…
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पूरण खण्डेलवाल ने कहा…

ब्लॉग पर अच्छी फोटो के बजाय अच्छे लेखन की जरुरत होती है! आपकी बात से पूर्णतया सहमत हूँ !!

वाणी गीत ने कहा…

लेखन कोई मॉडलिंग तो है नहीं की फोटो से फर्क पड़ेगा ...अच्छा लेखन प्रशंसा पाता ही है !

आशा बिष्ट ने कहा…

Sahi baat..