शुक्रवार, 29 मार्च 2013

पुरुष का अकेलापन ज्यादा घातक

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अकेलापन एक ज़हर के समान होता है किन्तु इसे जितना गहरा ज़हर नारी के लिए कहा जाता है उतना गहरा पुरुष के लिए नहीं कहा जाता जबकि जिंदगी  का अकेलापन दोनों के लिए ही बराबर ज़हर का काम करता है .नारी  जहाँ तक घर के बाहर की बात है आज भी लगभग पुरुष वर्ग पर आश्रित है कोई भी लड़की यदि घर से बाहर जाएगी तो उसके साथ आम तौर पर कोई न कोई ज़रूर साथ होगा भले ही वह तीन-चार साल का लड़का ही हो इससे उसकी सुरक्षा की उसके घर के लोगों में और स्वयं भी मन में सुरक्षा की गारंटी होती है और इस तरह से यदि देखा जाये तो नारी के लिए पुरुषों के कारण भी अकेलापन घातक है क्योंकि पुरुष वर्ग नारी को स्वतंत्रता से रहते नहीं देख सकता और यह तो वह सहन ही नहीं कर सकता कि एक नारी पुरुष के सहारे के बगैर कैसे आराम से रह रही है इसलिए वह नारी के लिए अकेलेपन को एक डर का रूप दे देता  है और यदि पुरुषों के लिए अकेलेपन के ज़हर की हम बात करें तो ये नारी के अकेलेपन से ज्यादा खतरनाक है न केवल स्वयं उस पुरुष के लिए बल्कि सम्पूर्ण समाज के लिए क्योंकि ये तो सभी जानते हैं कि ''खाली दिमाग शैतान का घर होता है ''ऐसे में समाज में यदि अटल बिहारी जी ,अब्दुल कलाम जी जैसे अपवाद छोड़ दें तो कितने ही पुरुष कुसंगति से घिरे गलत कामों में लिप्त नज़र आते हैं .घर के लिए कहा जाता है कि ''नारी हीन घर भूतों का डेरा होता है ''तो ये गलत भी नहीं है क्योंकि घर को जिस साज संभाल की, सुरुचि की ज़रुरत होती है वह केवल नारी मन में ही पाई जाती है .पुरुषों  में अहंकार की भावना के चलते वे कभी अपनी परेशानी का उल्लेख करते नज़र नहीं आते किन्तु जब नारी का किसी की जिंदगी या घर में अभाव होता है तो उसकी जिंदगी या घर पर उसका प्रभाव साफ नज़र आता है नारी को यदि देखा जाये तो हमेशा  पुरुषों की सहयोगी  के रूप में ही नज़र आती  है उसे पुरुष की सफलता खलती नहीं बल्कि उसके चेहरे  पर अपने से सम्बंधित  पुरुष की सफलता एक नयी चमक ला देती है किन्तु पुरुष अपने से सम्बंधित नारी को जब स्वयं सफलता के शिखर पर चढ़ता देखता है तो उसके अहम् को चोट पहुँचती है और वह या तो उसके लिए कांटे बोने लगता है या स्वयं अवसाद में डूब जाता है.उदाहरण के लिए आप ''अभिमान''फिल्म को ही यद् कर लीजिये जिसमे नायक जब नायिका जो कि उसकी पत्नी है को अपने से अधिक सफल देखता है तो वह उसकी जिंदगी में उथल पुथल मचा कर उसका जीवन ही दुर्भर कर देता है .

     एक नारी फिर भी घर के बाहर के काम आराम से संपन्न कर सकती है यदि उसे पुरुष वर्ग के गलत रवैय्ये का कोई डर नहीं हो किन्तु एक पुरुष घर की साज संभाल  एक नारी की तरह कभी नहीं कर सकता क्योंकि ये गुण नारी को भगवान ने उसकी प्रकृति में ही दिया है आम तौर पर भी हम देखते हैं कि बाहर शहर में अकेले रह रहे पुरुष अपने अकेलेपन को दूर करने के लिए अपनी पत्नी से इतर रिश्ते को निभाने लगते हैं इसलिए ये कहना वास्तव में सही ही है कि पुरुषों का अकेलापन ज्यादा घातक होता है परिवार के लिए समाज के लिए देश के लिए सभी के लिए .
       शालिनी कौशिक
               

6 टिप्‍पणियां:

shorya Malik ने कहा…

बहुत ही सुंदर अभिव्यक्ति

डॉ शिखा कौशिक ''नूतन '' ने कहा…

sarthak prastuti .aabhar

Vyas Nepali ने कहा…

बहुत अच्छी जानकारी. धन्यवाद

देखें : नेपालनामा

भावना पाण्डेय ने कहा…

Haan shayad aap sahi kah rahi hain ...akelapan bahut ghatak hota hai .

पुरुषोत्तम पाण्डेय ने कहा…

बहुत भावपूर्ण प्रस्तुति. अंतर्मन की कथा है. साधुवाद.

Manohar Chamoli ने कहा…

बहुत अच्छी जानकारी.