मंगलवार, 23 जनवरी 2018

अभिमन्यु

अभिमन्यु
बनता जा रहा
आज का युवा
अपने ही चारों ओर
अपने ही द्वारा रचित
चक्रव्यूह में
अपने अंतर्द्वंद्वों को झेलता,
खुद से लड़ता,
स्वयं हथियार बन वार करता
स्वयं ढाल बन बचता।
स्वयं छिन्न-भिन्न हो, निशस्त्र होता।
स्वयं रथचक्र बन
स्वरक्षा हेतु घूमता ,
बनता जाता
क्या नियति के हाथों
इस बार भी धराशायी होगा?
या रण विजेता बन
लौटेगा सदर्प?
अभिमन्यु !!
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शालिनी रस्तौगी

गुरुवार, 11 जनवरी 2018

हाथ करें मजबूत ............

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भावनाएं वे क्या समझेंगे जिनकी आत्मा कलुषित हो ,
अटकल-पच्चू  अनुमानों से मन जिनका प्रदूषित हो .

सौंपा था ये देश स्वयं ही हमने हाथ फिरंगी के ,
दिल पर रखकर हाथ कहो कुछ जब ये बात अनुचित हो .

डाल गले में स्वयं गुलामी आज़ादी खुद हासिल की ,
तोल रहे एक तुला में सबको क्यूं तुम इतने कुंठित हो .

देश चला  है प्रगति पथ पर इसमें मेहनत है किसकी ,
दे सकता रफ़्तार वही है जिसमे ये काबिलियत हो .

अपने दल भी नहीं संभलते  कहते देश संभालेंगें ,
क्यूं हो ऐसी बात में फंसते जो मिथ्या प्रचारित हो .

आँखों से आंसू बहने की हंसी उड़ाई जाती है ,
जज्बातों को आग लगाने को ही क्या एकत्रित हो .

गलती भूलों  से जब होती माफ़ी भी मिल जाती है ,
भावुकतावश हुई त्रुटि पर क्यूं इनपर आवेशित हो .

पद लोलुपता नहीं है जिसमे त्याग की पावन मूरत हो ,
क्यूं न सब उसको अपनालो जो अपने आप समर्पित हो .

बढें कदम जो देश में अपने करने को कल्याण सभी का ,
करें अभिनन्दन आगे बढ़कर जब वह समक्ष उपस्थित हो .

हाथ करें मजबूत उन्ही के जिनके हाथ हमारे साथ ,
करे ''शालिनी ''प्रेरित सबको आओ हम संयोजित हों .
          शालिनी कौशिक 
           [कौशल ]