रविवार, 2 मार्च 2014

सिर्फ लड़की ही :-)

उस उदास लड़की के चेहरे को ध्यान से पढ़ो 
वहाँ आपको दुःख के सूखे हुए आंसू साफ़ नजर आयेंगे 
यह दुःख सिर्फ उसका नहीं हैं 
माँ ,दादी, भुआ ,बहन यहाँ तक कि 
पिता की भी पीड़ा समेटे हैं उसकी आँखें 
उनके तमाम दुखों के बीच वह भूल ही जाती हैं अपना दुःख 
कि यह सारे लोग इसलिए भी दुखी हैं कि 
वह लड़की हैं ,लड़का नहीं हैं !!!!

उसका नन्हा सा भाई मचलता रहता हैं उसकी गोद में चढ़ने को 
और गोद में उठाते ही वह ख़ुशी के मारे किलकारियाँ करने लगता हैं 
उसकी ख़ुशी से भूल ही जाती हैं वह अपना सारा दुःख 
यह भी कि भाई के नाम पर ही मारे जाते हैं उसे ताने 
उसे ही मिलता हैं सारा दुलार उसके हिस्से का 
इन सबके परे वह तो बस प्यार करती हैं उसे !!!!!


यकीनन लड़की जन्म से लेके अंत तक दूसरों या अपनों 
की ख़ुशी के लिये ही जीती हैं वो जिस दिन से यह सुनना शुरू 
करती हैं कि तुम लड़की हो तब से वो शुरू करती हैं अपनी खुशियों को कम करना 
वो शुरुआत करती हैं अपने सपनों को दफ़न करने की !!
लड़की का संस्कारी और समझदार होना ही उसकी आजादी को छीन लेता हैं 
चलो भई कई अरसे बीते अच्छे बनने के अब हम लड़कियाँ भी क्यों ना बन जाए थोड़ी बुरी 
ताकि जी सकेंगे हम भी थोड़ा अपने लिये, हम भी थोड़ी बाँहें फैला सकेंगे गुनगुनी सी धुप में !!

3 टिप्‍पणियां:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल सोमवार (03-03-2014) को "बसंत का हुआ आगमन" (चर्चा मंच-1540) में अद्यतन लिंक पर भी होगी!
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

parul chandra ने कहा…

हां बिलकुल शुरुआत करनी चाहिए... अपने हक के लिए ।सुंदर लेखन

Prasanna Badan Chaturvedi ने कहा…

वाह...प्रभावी रचना.....बहुत बहुत बधाई...