सोमवार, 11 नवंबर 2013

मुश्किल फैसला ...

                                                                                                                                                                                                                                                                               निशा ने राहुल को स्कूल के लिये तैयार किया और उसका लंच बॉक्स उसे दिया | राजेश को भी आज जल्दी निकलना था उनका भी लंच बॉक्स तैयार किया और निशा ने उन दोनों को विदा किया | घर का सारा काम ख़तम करते -करते आधा दिन ख़तम हो गया | अब निशा थोड़ी देर आराम करने अपने कमरे मे आयी ही थी कि फोन की बेल बजी | निशा ने रूखे -पन से फोन उठाया |
हेल्लो ,निशा मै काव्या बोल रही हूँ,अरे ! काव्या तुम,निशा ने खुश होते हुए कहा ,कैसी हो,ससुराल मे सब ठीक है ना, लोग अच्छे है ना जीजू अच्छे है ना ,निशा ने जैसे सवालों की झड़ी लगा दी | काव्या ने कहा ''रुको निशा, तम्हे सब बताने के लिये ही फोन किया है पर यहाँ फोन पर नहीं, तुम कल मेरे घर आ जाओ फिर  बैठ कर बाते करते है ,काव्या, ने दुखी मन से कहा और फोन कट कर दिया |
कल का जाना तय हुआ जानकर निशा, ने राहत महसूस की क्योंकि आज वो बहुत थकी हुई थी, पर अब उसको काव्या से मिलने की बेसब्री भी बहुत हो रही थी, तो उसको नींद भी नहीं आ रही थी | दुसरे दिन निशा ने जल्दी -जल्दी काम ख़तम किया और काव्या के घर पहुँच गयी | निशा ने काव्या को देखते ही कहा ''अरे! ये तेरे चेहरे पर उदासी क्यों ? नई -नई शादी हुई है,लालिमा की जगह ये कालिमा क्यो है ? क्या कुछ ठीक नहीं है क्या ससुराल मे ? काव्या ने कहा सब बताती हूँ''निशा मुझे लगता है मेरे पति क्ल्पेस के मन मे कोई बात है, जिसको लेकर वो मुझसे नाराज है; या उसके दिल मे कुछ और ही चल रहा है, पर क्या ? ये मेरी समझ मे नहीं आया | उसने मुझसे इन सात दिनों मे कभी कोई बात नहीं करी और अगले दिन भैया मुझे पग- फेरे की रश्म के लिये लिवाने आ गये मै, उनके साथ वापस यहाँ आ गयी हूँ |,
''तो क्या तुम्हारा वैवाहिक जीवन शुरू ही नहीं हुआ ? कल्पेश ने तुम्हे छुआ तक नहीं क्या,निशा ने पूछा, नहीं,काव्या ने कहा | तुमने कल्पेश से इस बारे मे पूछा कभी,''बहुत बार पूछा पर उसने कभी मेरी बात ही नहीं सुनी | ओह ! तमने अपने ससुराल मे किसी को बताया ?,नहीं , ये मैंने सही नही.. समझा इससे  कलपेश की और मेरी इज्जत ही कम होती ना| थोड़ी देर काव्या से बाते कर के निशा भारी मन से अपने घर आ गयी थी |
समय बीतता गया अब काव्या को छ माह से भी ज्यादा समय हो गया था, कल्पेश उसे लेने आया और ना ही उसका कोई सन्देश आया | काव्या ने एक पत्र भी लिखा था पर कोई जवाब नहीं आया | काव्या के मम्मी -पापा और बाकि सब भी काव्या को देख कर दुखी थे पर क्या कर सकते थे | काव्या के पापा ने कभी नहीं सोचा था कि इतना पढ़ा लिखा लड़का काव्या के लिये देखा फिर भी ये सब ये सब भुगतना पड़ेगा |
उस वक़्त काव्या को बी.कॉम .का दूसरा साल चल रहा था | एक दिन रात के खाने के वक़्त देवराज ने अपनी पत्नी उमा को कहा कि ''मैंने काव्या के लिये एक लड़का देख लिया है चार दिन बाद लडके वाले काव्या को देखने आयेगे |,अरे ! अभी क्या जल्दी है काव्या की शादी की अभी तो उसकी पढाई भी पूरी नहीं हुई है,कौनसी मेरी बेटी की उम्र बहुत ज्यादा हो गयी है ? पर काव्या के पापा ने हुकुम जरी करते हुए कह दिया कि अब इस बारे मे कोई बहस नहीं होगी | लड़के वाले आते ही होंगे एक दो दिन मे | तुम सब तैयार रहना |
काव्या ने ये सब निशा को बताया तो निशा ने काव्या को कहा कि ''काव्या ये कोई मजाक नहीं है, शादी गुड्डे -गुड्डी का खेल नहीं होती है | ये तुम्हारे भविष्य का सवाल है किसी तरह अपने पापा को समझा कर अभी शादी मत होने दो और अपनी पढाई पूरी कर लो तुम |,निशा ने कहना जरी रखा कि ''काव्या कभी -कभी हम औरतो के जीवन मे मुश्किल घड़ी आ जाती है तब अगर हम किसी योग्य है तो अपना मुश्किल वक़्त भी आसानी से तय कर सकती है नहीं तो नहीं | काव्या ने कहा ''निशा अब कुछ नहीं होने वाला है पापा का फैसला अटल है मम्मी ने अपनी तरफ से बहुत कोशिश की पर सब बेकार गयी पापा जो चाहते है वो ही होता है | आख़िरकार काव्या की शादी कर दी गयी थी |
अब काव्य के पापा मम्मी बहुत दुखी है अपने फैसले से सोच रहे है कि काश ,काव्या को पढने दिया होता तो आज ये दिन ना देखना पढता | वो ये सोच के और भी हैरान है कि इतना पढ़ा -लिखा समझदार लड़का है कल्पेश पर उसने ऐसा क्यों किया काव्या के साथ, क्या गल्ती हुई होगी काव्या से | उमा देवी अपने पति को अपनी बेटी काव्या की इस हलत का जिम्मेदार मानती है | पर इन सब मे काव्या को ही भुगतना पढ़ रहा है |
आखिरकर काव्या के पापा ने एक फैसला किया कि कल्पेश से बात करने के लिये अपने बेटे हरीश को भेजा जाये | अपनी पत्नी उमा से कहा कि कल हरीश को जल्दी से खाना बना के दे देना उसे काव्या की ससुराल जाना है | उमा को ये बात ठीक लगी क्योंकि वो अपनी बेटी को अब और दुखी नहीं देख सकती थी |पूरी रात ट्रेन का सफर तय कर के जब हरीश काव्या की ससुराल पहुंचा तो सब ने उसकी बहुत खातिर की | जिसकी उसने उम्मीद नहीं की थी | खाना खाने के बाद जब कल्पेश उसे अपने कमरे मे ले गया तो हरीश ने अच्छा मौका जानकर कहा ''आप काव्या को लेने अब तक क्यों नहीं आये ऐसा क्या हुआ था उससे जिसकी आपने उसे इतनी बड़ी सजा दे दी | काव्या का आपके इस रूखेपन से बुरा हाल है उसका सुख -चैन सब आपके कारण खो गया है |,
अब कल्पेश ने अपने मन की बात बताने मे ही भलाई समझी ''मैंने मन -ही मन आप से ये उम्मीद की थी कि आप क्लिनिक खोलने मे मेरी आर्थिक मदद करोगे,पर आपकी और से कोई आश्वासन ना पाकर मैंने काव्या को मायके भेज कर अपना सारा ध्यान बैंक लोन ,और पैसो के जुगाड़ मे लगाया  ,सोचा काव्या काव्या को भेज कर अपना काम आराम से कर सकूंगा ,जब क्लिनिक खुल जायेगा वापस काव्या को घर ले आऊंगा |, इतनी बात कह कर कल्पेश ने कहा जल्दबाजी मे मै इस बारे मे काव्या और किसी को भी कुछ बता नहीं सका ,इसके लिए आप सब से माफ़ी चाहता हूँ |,इतनी सी बात के लिये आपने इतने दिन लगा दिए | ,आपका काम हो जायेगा,हरीश ने कहा,आप एक इशारा करते आपका काम हो जाता  और वो उन सब से विदा लेकर अपने घर आ गया था |
मम्मी -पापा उसकी प्रतीक्षा मे ही थे जैसे ही हरीश आया उन्होंने पूछना शुरू किया ''क्या हुआ वहां जाने स कुछ बात बनी ,'हाँ सब ठीक है बस कल्पेश को रूपया चाहिए अपने क्लीनिक के लिये |, पापा ने कहा ''ये कोई बहुत बड़ी बात नहीं है, कल ही तुम दस लाख का चेक और काव्या को ले कर जाना | काव्या ने पापा और भैया की बाते सुनली थी और उसने एक मुश्किल फैसला कर लिया |अगले ही दिन माँ ने काव्या को हरीश के ससुराल जाने को कहा तो उसने कहा ''मैंने आपकी और भैया की सब बाते सुनली है,सुनने के बाद मैंने अपने जीवन का मुश्किल फैसला कर लिया है कि मै, ऐसे आदमी के साथ अपना जीवन नहीं काट सकती, जिसको इंसान की कोई कद्र नहीं है, और जो पैसो के आगे इंसान की भावना की कद्र ना कर सके | आपको एक पैसा भेजने की जरुरत नहीं है | अब मै अकेले ही अपना जीवन गुजारुंगी | इतना कह कर वो अपने कमरे चली गयी और रोने लगी |
थोड़ी देर रोने के बाद काव्या ने तय किया की अब वो रोएगी नहींऔर अपने जीवन के रास्ते को एक नया मोड़ देगी | और कल्पेश को भी सबक सिखाएगी | उसने गरीब बच्चो को पढ़ाने के लिए एक स्कूल खोला | उस स्कूल मे सिर्फ वो ही बच्चे आ सकते थे जिनके माता -पिता मजदूरी करते है |अपने बच्चो का सिर्फ पेट भर सकते है | काव्या के इस काम मे उसके पापा ने पूरा सहयोग देने को कहा | पैसा तो बहुत था उनके पास तो काव्या ने पापा से कहा ''कल्पेश को उसकी मांग पर एक बार पैसा देते तो उसकी मांग बार -बार बढ़ना कोई बड़ी बात नहीं है | उसकी नाजायज मांग पूरी करने के बजाय तो इन गरीब बच्चो का भला करे तो इनकी जिन्दगी संवर जाएगी |
एक साल बाद काव्या की स्कूल मे ऐसे सौ बच्चे पढने के लिए आ गए थे | पढाई के साथ काव्या बच्चो को कपड़े,किताबे ,कापी के आलावा दोपहर का भोजन भी देती थी | अब काव्या ने कल्पेश से कानूनन अलग होने के लिए कोर्ट मे एप्लीकेसन लगा दी | तो कल्पेश की माँ आई और कया को घर चलने को कहा | काव्या ने भी कह दिया ''आप उस वक्त क्यों नहीं कुछ बोले जब मुझे कल्पेश की और आपकी ज्यादा जरुरत थी अब मैंने अकेले रह कर जीना सीख लिया है|, और वो अपने कमरे मे चली गयी | उसे बहुत काम जो देखना था |
 शांति पुरोहित 

5 टिप्‍पणियां:

Saras ने कहा…

शांति आपकी हर कहानी में कोई न कोई सन्देश होता है ..एक पॉजिटिव एनर्जी होती है .....अच्छी लगती है आपकी कहानी ...बड़े ही सहज तरीके से चल रही कहानी में एक ऐसा मोड़ आता है ...कि लगता है अरे यह तो बहुत अच्छा हुआ ...या अलग हटकर हुआ ...ऐसे ही लिखती रहिये .....शुभकामनाएं

Upasna Siag ने कहा…

bahut badhiya prerna deti huyee kahani hai shanti ji ....aise hi likhti rahiye aur ham padhte rahen ..(y)

Shanti Purohit ने कहा…

सरस आपका बहुत शुक्रिया

Shanti Purohit ने कहा…

उपासना आपका बहुत शुक्रिया

Vinnie Pandit ने कहा…

मेरे विचार में काव्या की तरह हर स्त्री को अपना रास्ता ढूढ लेना चाहिये।तभी कल्पेश जैसे पुरूषॉ को अपने गल्त होने का आभास होगा।

विन्नी,