सोमवार, 29 जुलाई 2013

फरेब लिए मुहं से मिलें हाथ जोड़कर ,

 
.फरेब लिए मुहं से मिलें हाथ जोड़कर ,

  नुमाइंदगी करते हैं वे जनाब आली ,

जजमान बने फिरते हैं वे जनाब आली .
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देते हैं जख्म हमें रुख बदल-बदल ,
छिड़कते फिर नमक हैं वे जनाब आली .
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मुखालिफों को हक़ नहीं मुहं खोलने का है ,
जटल काफिये उड़ाते हैं वे जनाब आली .
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ज़म्हूर को कहते जो जनावर जूनून में ,
फिर बात से पलटते हैं वे जनाब आली .
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फरेब लिए मुहं से मिलें हाथ जोड़कर ,
पीछे से वार करते हैं वे जनाब आली .
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मैदान-ए-जंग में आते हैं ऐयार बनके ये ,
ठोकर बड़ों के मारते हैं वे जनाब आली .
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जम्हूरियत है दागदार इनसे ही ''शालिनी ''
झुंझलाके क़त्ल करते हैं वे जनाब आली .
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                      शालिनी कौशिक 
                               [कौशल ]

शब्दार्थ -नुमाइंदगी-प्रतिनिधित्व ,जनाब आली -मान्य महोदय ,जजमान-यजमान ,जटल काफिये उड़ाना-बेतुकी व् झूठी  बाते करना ,जम्हूर-जनसमूह ,जम्हूरियत-लोकतंत्र .

3 टिप्‍पणियां:

Neelima sharma ने कहा…

मुश्किल उर्दू लफ्जों से सजी एक उम्दा पोस्ट

lori ali ने कहा…

wwah!

Lalit Chahar ने कहा…

सुन्दर प्रस्तुति! हिंदी ब्लॉगर्स चौपाल {चर्चामंच} की पहली चर्चा हिम्मत करने वालों की हार नहीं होती -- हिंदी ब्लॉगर्स चौपाल चर्चा : अंक-001 में आपका सह्य दिल से स्वागत करता है। कृपया पधारें, आपके विचार मेरे लिए "अमोल" होंगें | आपके नकारत्मक व सकारत्मक विचारों का स्वागत किया जायेगा | सादर .... Lalit Chahar