बुधवार, 18 जून 2014

कल्पना हर पुरुष मन की .



अधिकार 

सार्वभौमिक सत्ता 
सर्वत्र प्रभुत्व 
सदा विजय 
सबके द्वारा अनुमोदन 
मेरी अधीनता 
सब हो मात्र मेरा 

कर्तव्य 

गुलामी 
दायित्व ही दायित्व 
झुका शीश 
हो मात्र तुम्हारा 
मेरे हर अधीन का 

बस यही कल्पना 

हर पुरुष मन की .

शालिनी कौशिक 

   

3 टिप्‍पणियां:

shikha kaushik ने कहा…

purush man kee achchhi thah lee hai aapne .aabhar

shikha kaushik ने कहा…

purush man kee achchhi thah lee hai aapne .aabhar

Virendra Kumar Sharma ने कहा…

नर हो या नारी प्रभुत्व कायम रखना धौंस ज़माना कुछ की फितरत में शुमार हो जाता है बहर सूरत दुनिया अपनी ढाल (अपनी तरह से )ही चलती है लकह करे किन कोय। बढ़िया पोस्ट शालिनी जी ,आभार आपके आदर -नेहा का ,फलो - फूलो -विकसो -खिलो फूल बनके फैलो खुशबू बनके।