शनिवार, 12 जुलाई 2014

अपने को किसी हाल ये सुधारते नहीं !


औरत पे ज़ुल्म हो रहे कर रहा आदमी
सच्चाई को कुबूलना ये चाहते नहीं ,
गैरों के कंधे थामकर बन्दूक चलना
ये कर रहे हैं काम मगर मानते नहीं !
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औरत को जूती पैर की ही माने आदमी
सम्मान देने रोग मान पालते नहीं ,
ये चाहें इसपे बस हुक्म चलाना
 करना भला इसका कभी विचारते नहीं !
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औरत लुटा दे मर्द पर भले ही ज़िंदगी
वे रहते हैं कभी किसी मुगालते नहीं ,
खिदमत हमारी करना औरत की है किस्मत
करना है कुछ उसके लिए ये जानते नहीं !
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जनम-जनम का साथ है पत्नी पति का मांगती
ये पत्नी को दिल में कभी उतारते नहीं ,
चाह रखके बेटों की ये बेटियां हैं मारती
ये बुराई तक माँ के लिए हैं मारते नहीं !
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''शालिनी ''की तड़प का है ना सबूत कोई
अपने किये को ये कभी धिक्कारते नहीं ,
बेटी हो या बहन हो ,ये पत्नी हो या माँ हो
अपने को किसी हाल ये सुधारते नहीं !
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शालिनी कौशिक
       [कौशल ]

4 टिप्‍पणियां:

Anusha ने कहा…

सुन्दर प्रस्तुति
सादर

Smita Singh ने कहा…

सुन्दर प्रस्तुति।

Kailash Sharma ने कहा…

बदलना होगा एक दिन समाज को अपना रवैया औरतों के प्रति...बहुत सटीक और प्रभावी अभिव्यक्ति...

jyoti dehliwal ने कहा…

शालिनी जी,पुरुष जब अपने आपको
सुधार लेंगे तब हर घर स्वर्ग बन जाएगा!